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“बिरसा मुंडा की ज्वाला व प्रेस की स्वतंत्रता” एमसीयू रीवा में जनजातीय गौरव, राष्ट्रीय प्रेस दिवस पर हुई संगोष्ठी

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जल–जंगल–जमीन से लेकर प्रेस की स्वतंत्रता की चर्चा से गूंजा एमसीयू परिसर।

जनजातीय गौरव दिवस पर विचार मंथन

रीवा। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, रीवा परिसर में राष्ट्रीय प्रेस दिवस, भगवान बिरसा मुंडा जयंती तथा जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय परिसर के निदेशक डॉ. सत्येंद्र डहेरिया, एडजंक्ट प्रोफेसर जयराम शुक्ला, डॉ.नवीन तिवारी,प्रो. कनिष्क तिवारी,शिक्षकगण और विद्यार्थी उपस्थित रहे।

हरी पत्तियों की सरसराहट, पहाड़ों की निस्तब्धता और धरती की गंध से भरी उन जनजातीय परंपराओं की स्मृति के बीच, जहाँ जल, जंगल और जमीन साधन के साथ जीवन की धड़कन माने जाते हैं, एमसीयू रीवा विश्वविद्यालय का सभागार इस आयोजन में अलग ही ऊर्जा से युक्त दिखा।

प्रकृति की गोद में पले जनजातीय नायकों की विरासत और लोकतंत्र की सांस मानी जाने वाली स्वतंत्र पत्रकारिता—दोनों की चेतना को एक साथ महसूस करती यह गोष्ठी मानो इतिहास, संस्कृति और सत्य का ऐसा संगम बन गई, जहाँ बिरसा मुंडा की ज्वाला और प्रेस की कलम—दोनों एक ही स्वर में समाज के जागरण का संदेश देती प्रतीत हुईं।

बिरसा मुंडा


इस दौरान विषय प्रवेश करवाते हुए डॉ.नवीन तिवारी ने कहा कि बिरसा मुंडा का संघर्ष संस्कृति और प्रकृति की रक्षा के लिए था, वक्तव्य में आगे इन्होंने बताया कि भगवान बिरसा मुंडा का आंदोलन केवल अंग्रेजों के विरुद्ध नहीं, बल्कि जल–जंगल–जमीन, अपनी सांस्कृतिक पहचान और धर्मांतरण के विरुद्ध एक चेतना का उदय था।

बिरसा का परिवार अंग्रेज शासनकाल में धर्मांतरण की प्रक्रिया का शिकार हुआ। मिशन स्कूल में पढ़ते हुए बिरसा को जब इसके पीछे की राजनीतिक मंशा समझ आई, तो उन्होंने “अपने मूल की ओर लौटो” का संदेश दिया। मुंडा समाज सूर्य को ‘सिंह बोंगा’ और चंद्रमा को ‘निदा बोंगा’ के रूप में पूजता है। मात्र 25 वर्ष की आयु में शहीद हुए, पर उनका आंदोलन आज भी जनजातीय समाज की चेतना है। इस दौरान उन्होंने सिद्धू–कान्हू, फूलो–झानो और संथाल परगना के संघर्षों का भी उल्लेख किया।


एडजंक्ट प्रोफेसर जयराम शुक्ला ने अपने विचारों में पत्रकारिता के उस स्वर्णिम और संघर्षशील इतिहास को मानो पुनर्जीवित कर दिया हो, जहाँ कलम सत्ता के सिंहासन को चुनौती देने की हिम्मत रखती थी। उन्होंने रेखांकित किया कि महात्मा गांधी की नौ बार की जेल-यात्राएँ हों या लोकमान्य तिलक की धधकती हुई लेखनी—भारत की पत्रकारिता हमेशा से सत्य का व्रत निभाने वाली तपस्विनी रही है। अंग्रेजी शासन की भयावह सेंसरशिप के बीच जब हर शब्द को फाँसी का फंदा समझा जाता था, तब भी भारतीय प्रेस ने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया।

शुक्ल ने कहा कि आज भी पत्रकार की शक्ति किसी कानून से नहीं, बल्कि जनता के विश्वास से उपजती है; और वही विश्वास उसे रात के अंधेरों में भी सच की मशाल जलाए रखने का साहस देता है। उनके शब्दों ने स्पष्ट किया कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, यह स्वतंत्रता, साहस और जनहित की निरंतर साधना है।

लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया आवश्यक: डॉ. डहेरिया


विचार गोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए निदेशक डॉ. सत्येंद्र डहेरिया ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष मीडिया अत्यंत आवश्यक है।


श्री डहेरिया ने आगे कहा कि— “जहाँ लोकतंत्र नहीं होता, वहाँ मीडिया सेंसरशिप और सत्ता के नियंत्रण में बंधा रहता है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया जनता की आवाज बनकर खड़ा होता है।”

डॉ. डहेरिया ने बताया कि संविधान ने प्रेस को ‘चौथे स्तंभ’ का दर्जा नहीं दिया, यह सम्मान जनता ने उसकी भूमिका को देखकर प्रदान किया है। उन्होंने प्रेस परिषद के गठन (16 नवंबर 1966) का उल्लेख करते हुए कहा कि परिषद मीडिया को उसके उत्तरदायित्व की लगातार याद दिलाती है।


सोशल मीडिया पांचवां स्तंभ बन चुका है: प्रो. कनिष्क तिवारी


प्रो. कनिष्क तिवारी ने कहा कि आज देश में लगभग एक लाख 35 हजार से अधिक समाचार-पत्र, करीब 09 सौ टीवी चैनल और लगभग 3 लाख पंजीकृत पत्रकार काम कर रहे हैं। इस सब के साथ “सोशल मीडिया अब पाँचवाँ स्तंभ बन चुका है। यह बड़ी ताकत भी है और बड़ी चुनौती भी, क्योंकि फेक न्यूज़ का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।” उन्होंने मीडिया में नैतिकता, विश्वसनीयता और तथ्य-जांच की आवश्यकता पर जोर दिया।

विचार मंथन में विद्यार्थियों ने भी रखे विचार बीएमसी की छात्रा ऐश्वर्या श्रीवास्तव ने फैक्ट चेक और जिम्मेदार पाठक–श्रोता बनने की आवश्यकता पर जोर दिया। अन्य छात्रों—लक्ष्य प्रताप सिंह, जसमीत, काजल मिश्रा ने पत्रकार सुरक्षा, मीडिया की जिम्मेदारी और जनजातीय नायकों की विरासत पर अपने विचार साझा किए।


आभार प्रदर्शन करते हुए प्रो.आरती श्रीवास्तव ने कहा कि हमारी गोष्ठी जनजातीय नायकों की सांस्कृतिक–पर्यावरणीय संघर्ष और प्रेस की स्वतंत्रता की लड़ाई दोनों भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को मजबूती देती हैं। मीडिया, समाज और संस्कृति— तीनों की सुरक्षा और स्वतंत्रता ही देश को मजबूत, जागरूक और प्रगतिशील बनाती है। इस आयोजन में शामिल सभी प्रतिभागियों अतिथियों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।


इस विचार मंथन के दौरान, अंबुज पाण्डेय, डा. नवीन कुमार तिवारी,प्रो. कनिष्क तिवारी, प्रो.आरती श्रीवास्तव,प्रो.अजीत कुमार मिश्र, डा. सुनील कुमार, प्रो. वंदना तिवारी, प्रो. प्रदीप के.शुक्ल, प्रो. अपर्णा गोस्वामी. प्रो. सोमेंद्र सिंह, डा. नीति मिश्रा, प्रो. सौरभ मिश्रा, सहित समस्त स्टाफ एवं छात्र छात्राओं की उपस्थिति रही।

T20news.in

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